पेट के अच्छे बैक्टीरिया: प्रोबायोटिक्स को हम कैसे बढ़ाएँ

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पेट के अच्छे बैक्टीरिया: प्रोबायोटिक्स को हम कैसे बढ़ाएँ

आजकल पेट की समस्या, गैस, कब्ज, बार-बार बीमार पड़ना, थकान और तनाव- ये सब आम हो गए हैं। इसकी एक बड़ी वजह है आंतों में अच्छे बैक्टीरिया की कमी। यही अच्छे बैक्टीरिया प्रोबायोटिक्स कहलाते हैं।

जो हमारी आंतों (gut) में रहते हैं और पाचन, इम्यूनिटी, हार्मोन बैलेंस और यहाँ तक कि मूड को भी बेहतर बनाते हैं। सरल शब्दों में, ये पेट के दोस्त बैक्टीरिया हैं, जो बुरे बैक्टीरिया को काबू में रखते हैं। इन्हें रोज़ के खान‑पान में शामिल करना आसान है, बस सही फूड्स चुनने की ज़रूरत होती है।

इस ब्लॉग में हम बहुत आसान भाषा में समझेंगे कि प्रोबायोटिक्स क्या होते हैं, ये हमारे शरीर के लिए क्यों ज़रूरी हैं और इन्हें रोज़मर्रा के खाने से कैसे बढ़ाया जा सकता है।

प्रोबायोटिक्स क्या होते हैं

प्रोबायोटिक्स ऐसे ज़िंदा बैक्टीरिया और यीस्ट हैं जो सही मात्रा में लेने पर शरीर, खासकर आंत (गट), के लिए फायदेमंद माने जाते हैं।
ये हमारी आँतों में रहने वाले अच्छे बैक्टीरिया की संख्या बढ़ाकर हानिकारक कीटाणुओं को कंट्रोल करने, गैस–कब्ज कम करने और पाचन सुधारने में मदद करते हैं।

हमारे पेट के अंदर करोड़ों बैक्टीरिया रहते हैं। इनमें से कुछ अच्छे होते हैं और कुछ खराब। प्रोबायोटिक्स अच्छे जीवित बैक्टीरिया हैं जो हमारे पेट को सही ढंग से काम करने में मदद करते हैं। इन्हें आप ऐसे समझिए जैसे ये पेट के सफ़ाई कर्मचारी हैं, जो गंदगी फैलाने वाले बैक्टीरिया को कंट्रोल में रखते हैं।

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प्रोबायोटिक्स हमारे शरीर में क्या काम करते हैं?

जब पेट में अच्छे बैक्टीरिया सही मात्रा में होते हैं, तो:

  • खाना सही से पचता है
  • गैस, एसिडिटी और कब्ज कम होती है
  • शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ती है
  • बार-बार पेट का इन्फेक्शन नहीं होता
  • तनाव और बेचैनी भी कम महसूस होती है
  • मूड व दिमाग की सेहत पर भी पॉज़िटिव असर दिखता है।

इसीलिए कहा जाता है –“Healthy Gut = Healthy Body + Healthy Mind”

प्रोबायोटिक की कमी के लक्षण क्या हैं?

प्रोबायोटिक्स की कमी से आंतों में अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे पाचन संबंधी कई समस्याएं हो सकती हैं। अगर आपके शरीर में प्रोबायोटिक्स कम हो रहे हैं, तो ये संकेत मिल सकते हैं:

  • पेट भारी रहना
  • गैस, एसिडिटी, कब्ज
  • बार-बार दस्त या पेट खराब होना
  • हर समय थकान
  • स्किन प्रॉब्लम- जैसे एक्जिमा, एलर्जी
  • इम्युनिटी कम होना
  • एंग्जायटी या मूड स्विंग
  • सूजन और IBS (चिड़चिड़ा आंत्र सिंड्रोम) जैसे लक्षण
  • संक्रमण जैसे UTI (मूत्र मार्ग संक्रमण)

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रोज़मर्रा के प्रोबायोटिक फूड (भारतीय विकल्प)

अच्छी बात यह है कि प्रोबायोटिक्स के लिए महंगे सप्लीमेंट ज़रूरी नहीं। हमारे घर का साधारण खाना ही काफी है। जाड़े में ठंड से पाचन धीमा हो जाता है, इसलिए प्रोबायोटिक्स वाले गर्माहट देने वाले फूड्स पर फोकस करें जो इम्यूनिटी भी बढ़ाएं। नीचे दिए गए ज़्यादातर फूड आसानी से भारतीय किचन में मिल जाते हैं और इन्हें डेली रूटीन में शामिल किया जा सकता है।

1. दही / घर का सेट किया हुआ दही: सबसे आसान और सस्ता प्रोबायोटिक; दही में प्राकृतिक अच्छे बैक्टीरिया होते हैं। इसे रोज़ एक–दो कटोरी खाया जा सकता है। ध्यान रखें: फ्रिज की बहुत पुरानी/खट्टी दही न लें, घर की जमी ताज़ी दही सबसे अच्छी होती है।

2. छाछ: पेट का सबसे अच्छा दोस्त है। छाछ दही से भी हल्की होती है और जल्दी पचती है। यह पाचन सुधारती है, पेट को ठंडक देती है, गैस और जलन कम करती है और गट हेल्थ के लिए अच्छी होती है।

3. इडली, डोसा, ढोकला जैसे किण्वित (Fermented) फूड: ये खाने किण्वन/खमीर प्रक्रिया से बनते हैं, जिससे अच्छे बैक्टीरिया पैदा होते हैं। इडली, डोसा, ढोकला, अप्पम आदि को भोजन में हफ्ते में 2–3 बार शामिल करना फायदेमंद है।

4. घर का बना अचार: पुराने तरीके से घर में बना अचार, जिसमें सिरका न हो, जैसे गाजर, गोभी, शलगम, नींबू का अचार, जिनमें फर्मेंटेशन से अच्छे बैक्टीरिया बनते हैं। वह भी प्रोबायोटिक्स का अच्छा स्रोत होता है। बस मात्रा कम रखें, क्योंकि ज्यादा नमक नुकसान कर सकता है।
5. फर्मेंटेड चावल : पिछले दिन के भीगे हुए चावल को कई भारतीय राज्यों में सुबह नाश्ते में लिया जाता है। इनका सेवन हल्के प्रोबायोटिक फूड की तरह किया जाता है। इसमें दही मिलकर प्याज जीरे राइ का छौंक लगाते हैं।

6. कांजी: गाजर और चुकंदर से बनी कांजी एक बेहतरीन प्रोबायोटिक ड्रिंक है। यह फर्मेंटेशन प्रक्रिया से बनती है, जिसमें अच्छे बैक्टीरिया जैसे लैक्टोबैसिलस बढ़ते हैं, जो आंतों के स्वास्थ्य को मजबूत बनाते हैं। कांजी पाचन सुधारती है, कब्ज-गैस जैसी समस्याओं से राहत देती है और इम्यूनिटी बढ़ाती है। रोज़ 1 गिलास पीना पर्याप्त है।

7. अन्य फर्मेंटेड फूड: जैसे टेम्पेह, केफिर, किमची, सॉकरक्राट आदि, जो आजकल बड़े शहरों में आसानी से उपलब्ध होने लगे हैं।

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किन चीज़ों से प्रोबायोटिक्स नष्ट हो जाते हैं?

अगर आप नीचे दी गयी आदतें रखते हैं, तो अच्छे बैक्टीरिया मरने लगते हैं और शरीर में अनेक बीमारियां पैदा होने लगती हैं –

  • बार-बार एंटीबायोटिक दवाइयाँ खाना
  • बहुत ज्यादा चीनी का प्रयोग
  • जंक फूड और पैकेट वाला खाना
  • ज्यादा तला-भुना खाना
  • लगातार तनाव या चिंता
  • नींद की कमी

ध्यान रखने योग्य बातें

  • बहुत ज़्यादा मीठा दही, फ्लेवर्ड योगर्ट या पैकेज्ड ड्रिंक्स में शुगर ज़्यादा हो सकती है, इसलिए साधारण या घर का बना दही लेना ही बेहतर है।
  • अचार हमेशा सीमित मात्रा में खाएँ, क्योंकि नमक और तेल ज़्यादा होने से बीपी या वजन बढ़ने की दिक्कत वाले लोगों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
  • किसी को पेट से जुड़ी क्रॉनिक बीमारी, इम्यूनिटी प्रॉब्लम या दवाई चल रही हो तो बहुत ज़्यादा प्रोबायोटिक सप्लिमेंट शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह ज़रूर लेना सही रहता है।

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निष्कर्ष

प्रोबायोटिक्स कोई दवा नहीं, बल्कि सही जीवनशैली का हिस्सा हैं। अगर आप रोज़ अपने भोजन में दही, छाछ, फाइबर युक्त भोजन और सादा खाना शामिल कर लें, तो पेट, इम्युनिटी और दिमाग- तीनों बेहतर काम करेंगे।

नोट : अगले ब्लॉग में हम प्रीबायोटिक्स के बारे में जानेंगे जो की असल में “इन अच्छे बैक्टीरिया का खाना” होते हैं। सरल भाषा में कहें तो प्रोबायोटिक्स सैनिक हैं और प्रीबायोटिक्स उनकी रोज़ की रोटी-सब्ज़ी। इसलिए दोनों को समझना और जानना आवश्यक है। 

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3 thoughts on “पेट के अच्छे बैक्टीरिया: प्रोबायोटिक्स को हम कैसे बढ़ाएँ”

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